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पुलिस FIR दर्ज नहीं करे, तो क्या करना चाहिए...?

 पुलिस FIR दर्ज नहीं करे, तो क्या करना चाहिए...?

चित्र प्रतीकात्मक है

एफआईआर का हिन्दी में मतलब प्रथम सूचना प्रतिवेदन, एफआईआर किसी अपराध के घटित होने के बाद पुलिस थाने में दर्ज करवाई जाती है... एफआईआर का उल्लेख IPC की धारा 154, CrPC-1973 में किया गया है, इस धारा में ये उल्लेख किया गया है कि एफआईआर किसी भी नजदीकी थाने में दर्ज करवाई जा सकती है...जरूरी नहीं है कि जिस थाना क्षेत्र में अपराध हुआ हो उसी थाना क्षेत्र में एफआईआर दर्ज करवाई जाए... आप किसी भी थाने में प्राथमिकी या एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं... संबंधित थाना क्षेत्र के अलावा किसी अन्य थाना क्षेत्र में दर्ज करवाई गई एफआईआर जीरो नंबर एफआईआर कहलाती है...!  पुलिस उस एफआईआर को नोट करेगी और उस पुलिस स्टेशन को भेज देगी, जिस थाना क्षेत्र में अपराध कारित हुआ है...!

अपराध केे दो प्रकारर होतेे हैं

  • संज्ञेय अपराध या Cognizable Offence
  • असंज्ञेय मामले या Non Cognizable Offence
संज्ञेय अपराध यानी गंभीर अपराध, इनमें हत्या, बलात्कार, लूट आदि आते हैं...!

असंज्ञेय अपराध यानी सामान्य अपराध जैसे संपति विवाद, अतिक्रमण, आपसी लेनदेन आदि...!

CrPC 1973, के अनुसूची 1 में सभी प्रकार के मामलों के विषय में उल्लेख किया गया है..!
जब व्यक्ति अपनी एफआईआर दर्ज करवाने पुलिस के पास जाता है तो पुलिस अपराध की श्रेणी का आकलन करती है और उसे अपने रजिस्टर में दर्ज करती है... पुलिस के पास दो तरह के रजिस्टर होते हैं... 
  • NCR रजिस्टर:- इस में सामान्य मामले दर्ज किए जाते हैं.
  • FIR रजिस्टर:- इसमें आपराधिक मामले दर्ज किए 
  • जाते हैं. 
असंज्ञेय मामलों में पुलिस आपकी रिपोर्ट को सिर्फ नोट डाउन ही करेगी और आपको न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के पास जाने के लिए कहेगी, यानी असंज्ञेय या सामान्य मामलों में पुलिस के स्थान पर मजिस्ट्रेट ही शिकायत दर्ज करता है. इसका उल्लेख सेक्शन 2 D, CrPC-1973, में किया गया है, जिसको आम बोलचाल की भाषा में परिवाद, कंप्लेन, या शिकायत कहते हैं... जैसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के मामले...! इससे आप समझ सकते हैं कि सभी मामले पुलिस के पास ही दर्ज नहीं करवाए जाते... कुछ मामले मजिस्ट्रेट के पास भी दर्ज करवाए जाते हैं. पुलिस का काम है अपराध का निवारण और शिकायत के बाद अभियुक्त को पकड़ना...!
जब भी आप शिकायत लेकर पुलिस के पास जाते हैं तो आप दो तरीके से शिकायत कर सकते हैं... मौखिक या लिखित... पुलिस आपके ऊपर दबाव नहीं डाल सकती कि आप शिकायत लिखकर दीजिए...! आपकी शिकायत अगर मौखिक है तो पुलिस का कर्मचारी आपकी शिकायत लिखेगा और अगर आपकी शिकायत लिखित में है तो उसे NCR रजिस्टर में दर्ज करेगा...! ये कार्य पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को दिया गया है...! मौखिक शिकायत में भारसाधक आपकी शिकायत लिखने के बाद आपको पढ़कर भी सुनाएगा...! आप सहमत होते हैं कि, हां यही बातें मैंने बताई हैं, तो एफआईआर रजिस्टर में आपको हस्ताक्षर करने होते हैं, आपको एफआईआर रजिस्टर में हस्ताक्षर करने होंगे...! आईपीसी सेक्शन 154 में ये प्रावधान है कि एफआईआर लिखने के बाद शिकायतकर्ता को एफआईआर की एक कॉपी फ्री ऑफ कोस्ट उपलब्ध करवाई जायेगी...! उस कॉपी में ये दर्ज होगा कि आईपीसी की किन किन धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है, अगर आपको दी गई कॉपी में आईपीसी की धाराओं का उल्लेख नहीं किया गया है तो, समझना चाहिए कि एफआईआर दर्ज नहीं गई है...!

  FIR नहीं लिखे जाने पर

आपके पास IPC की धारा 154, पैराग्राफ 2 के तहत ये अधिकार है कि आप संबंधित जिले के SP को अपने मामले का विवरण लिखकर भेजें...कि आप इस थाने में गए, आपने अपनी शिकायत उनको दी, लिखित में या मौखिक में, थाने में ये अधिकारी मिला और आपकी एफआईआर लिखने से मना कर दिया.इसके बाद SP की जिम्मेदारी है, वो अपने स्तर पर इस मामले का प्रकरण दर्ज करवाए...और पूरे मामले की जांच करवाएंगे... और आपको न्याय दिलाने में मदद करेंगे...!


ये बातें आपको हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए, आप जितना नॉलेज रखेंगे उतने ही पावरफुल होंगे... क्योंकि धन शक्ति देता और ज्ञान अपने आप में शक्ति है....!

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